असगर वजाहत | Asghar Wajahat | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

असगर वजाहत
जन्म सन् 1946द्ध
असगर वजाहत का जन्म पफतेहपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनकी
प्रारंभिक शिक्षा पफतेहपुर में हुई तथा विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम
विश्वविद्यालय से की। सन् 1955-56 से ही असगर वजाहत ने लेखन कार्य प्रारंभ कर दिया था।
प्रारंभ में उन्होंने विभिन्न पत्रा-पत्रिकाओं में लेखन कार्य किया, बाद में वे दिल्ली वेफ जामिया
मिल्लिया विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे। वजाहत ने कहानी, उपन्यास, नाटक तथा
लघुकथा तो लिखी ही हैं, साथ ही उन्होंने प़्ि
ाफल्मों और धारावाहिकों वेफ लिए पटकथा लेखन का काम
भी किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैंµदिल्ली पहुँचना है, स्वि¯मग पूल और सब कहाँ वुफछ,
आधी बानी, मैं ¯हदू हूँ ;कहानी संग्रहद्ध, पिफरंगी लौट आए, इन्ना की आवाश, वीरगति,
समिधा, जिस लाहौर नई देख्या तथा अकी ;नाटकद्ध सबसे सस्ता गोश्त ;नुक्कड़ नाटकोंद्ध का
संग्रह और रात में जागने वाले, पहर दोपहर तथा सात आसमान, वैफसी आगि लगाई
;प्रमुख उपन्यासद्ध।
असगर वजाहत की भाषा में गांभीर्य, सबल भावाभिव्यक्ति एवं व्यंग्यात्मकता है। मुहावरों तथा
तद्भव शब्दों वेफ प्रयोग से उसमें सहजता एवं सादगी आ गई है। असगर वजाहत ने
गशल की कहानी वृत्तचित्रा का निर्देशन किया है तथा बूँद-बूँद धारावाहिक का लेखन भी किया है।
शेर, पहचान, चार हाथ और साझा नाम से उनकी चार लघुकथाएँ दी गई हैं। शेर प्रतीकात्मक
और व्यंग्यात्मक लघुकथा है। शेर व्यवस्था का प्रतीक है जिसवेफ पेट में जंगल वेफ सभी जानवर
किसी न किसी प्रलोभन वेफ चलते समाते चले जा रहे हैं। ऊपर से देखने पर शेर अ¯हसावादी,
न्यायप्रिय और बु( का अवतार प्रतीत होता है पर जैसे ही लेखक उसवेफ मुँह में प्रवेश न करने
का इरादा करता है शेर अपनी असलियत में आ जाता है और दहाड़ता हुआ उसकी ओर
झपटता है। तात्पर्य यह कि सत्ता तभी तक खामोश रहती है जब तक सब उसकी आज्ञा का
पालन करते रहें। जैसे ही कोई उसकी व्यवस्था पर उँगली उठाता है या उसकी आज्ञा मानने
से इनकार करता है, वह खूँखार हो उठती है और विरोध में उठे स्वर को वुफचलने का प्रयास
करती है। इस कहानी वेफ माध्यम से लेखक ने सुविधाभोगियों, छद्म क्रांतिकारियों, अ¯हसावादियों
और सह-अस्तित्ववादियों वेफ ढोंग पर भी प्रहार किया है।

पहचान में राजा को बहरी, गूँगी और अंधी प्रजा पसंद आती है जो बिना वुफछ बोले, बिना
वुफछ सुने और बिना वुफछ देखे उसकी आज्ञा का पालन करती रहे। कहानीकार ने इसी यथार्थ
की पहचान कराई है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण वेफ दौर में इन्हें प्रगति और उत्पादन से
जोड़कर संगत और शरूरी भी ठहराया जा रहा है। इस छद्म प्रगति और विकास वेफ बहाने
राजा उत्पादन वेफ सभी साधनों पर अपनी पकड़ मशबूत करता जाता है। वह लोगों वेफ जीवन
को स्वर्ग जैसा बनाने का झाँसा देकर अपना जीवन स्वर्गमय बनाता है। वह जनता को एकजुट
होने से रोकता है और उन्हें भुलावे में रखता है। यही उसकी सपफलता का राज है।
चार हाथ पूँजीवादी व्यवस्था में मशदूरों वेफ शोषण को उजागर करती है। पूँजीपति
भाँति-भाँति वेफ उपाय कर मशदूरों को पंगु बनाने का प्रयास करते हैं। वे उनवेफ अहम और
अस्तित्व को छिन्न-भिन्न करने वेफ नए-नए तरीवेफ ढूँढते हैं और अंततः उनकी अस्मिता ही
समाप्त कर देते हैं। मशदूर विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं। वे मिल वेफ कल-पुर्शे बन गए
हैं और लाचारी में आधी मशदूरी पर भी काम करने वेफ लिए तैयार हैं। मशदूरों की यह लाचारी
शोषण पर आधारित व्यवस्था का परदाप़्
ाफाश करती है।
साझा में उद्योगों पर कब्जा जमाने वेफ बाद पूँजीपतियों की नशर किसानों की शमीन और
उत्पाद पर जमी है। गाँव का प्रभुत्वशाली वर्ग भी इसमें शामिल है। वह किसान को साझा खेती
करने का झाँसा देता है और उसकी सारी पफसल हड़प लेता है। किसान को पता भी नहीं चलता
और उसकी सारी कमाई हाथी वेफ पेट में चली जाती है। यह हाथी और कोई नहीं बल्कि समाज
का धनाढ्य और प्रभुत्वशाली वर्ग है जो किसानों को धोखे में डालकर उसकी सारी मेहनत गड़प
कर जाता है। यह कहानी आशादी वेफ बाद किसानों की बदहाली का वर्णन करते हुए उसवेफ
कारणों की भी पड़ताल करती है।

शेर
मैं तो शहर से या आदमियों से डरकर जंगल इसलिए भागा था कि मेरे सिर पर सींग निकल रहे
थे और डर था कि किसी-न-किसी दिन कसाई की नशर मुझ पर शरूर पड़ जाएगी।
जंगल में मेरा पहला ही दिन था जब मैंने बरगद वेफ पेड़ वेफ नीचे एक शेर को बैठे हुए देखा।
शेर का मुँह खुला हुआ था। शेर का खुला मुँह देखकर मेरा जो हाल होना था वही हुआ, यानी मैं
डर वेफ मारे एक झाड़ी वेफ पीछे छिप
गया।
मैंने देखा कि झाड़ी की ओट भी
गशब की चीश है। अगर झाड़ियाँ न
हों तो शेर का मुँह-ही-मुँह हो और
पिफर उससे बच पाना बहुत कठिन हो जाए। वुफछ देर वेफ बाद मैंने देखा कि जंगल वेफ छोटे-मोटे
जानवर एक लाइन से चले आ रहे हैं और शेर वेफ मुँह में घुसते चले जा रहे हैं। शेर बिना हिले-डुले,
बिना चबाए, जानवरों को गटकता जा रहा है। यह दृश्य देखकर मैं बेहोश होते-होते बचा।

अगले दिन मैंने एक गधा देखा जो लंगड़ाता हुआ शेर वेफ मुँह की तरप़्
ाफ चला जा रहा था। मुझे
उसकी बेववूफपफी पर सख्त गुस्सा आया और मैं उसे समझाने वेफ लिए झाड़ी से निकलकर उसवेफ
सामने आया। मैंने उससे पूछा, फ्तुम शेर वेफ मुँह में अपनी इच्छा से क्यों जा रहे हो?य्
उसने कहा, फ्वहाँ हरी घास का एक बहुत बड़ा मैदान है। मैं वहाँ बहुत आराम से रहूँगा और
खाने वेफ लिए खूब घास मिलेगी।य्
मैंने कहा, फ्वह शेर का मुँह है।य्
उसने कहा, फ्गधे, वह शेर का मुँह शरूर है, पर वहाँ है हरी घास का मैदान।य् इतना कहकर
वह शेर वेफ मुँह वेफ अंदर चला गया।
पिफर मुझे एक लोमड़ी मिली। मैंने उससे पूछा, फ्तुम शेर वेफ मुँह में क्यों जा रही हो?य्
उसने कहा, फ्शेर वेफ मुँह वेफ अंदर रोशगार का दफ्र
़तर है। मैं वहाँ दरख्वास्त दूँगी, पिफर मुझे
नौकरी मिल जाएगी।य्
मैंने पूछा, फ्तुम्हें किसने बताया।य्
उसने कहा, फ्शेर ने।य् और वह शेर वेफ मुँह वेफ अंदर चली गई।
पिफर एक उल्लू आता हुआ दिखाई दिया। मैंने उल्लू से वही सवाल किया।
उल्लू ने कहा, फ्शेर वेफ मुँह वेफ अंदर स्वर्ग है।य्
मैंने कहा, फ्नहीं, यह वैफसे हो सकता है।य्
उल्लू बोला, फ्नहीं, यह सच है और यही निर्वाण का एकमात्रा रास्ता है।य् और उल्लू भी शेर
वेफ मुँह में चला गया।
अगले दिन मैंने वुफत्तों वेफ एक बड़े जुलूस को देखा जो कभी हँसते-गाते थे और कभी विरोध
में चीखते-चिल्लाते थे। उनकी बड़ी-बड़ी लाल जीभें निकली हुई थीं, पर सब दुम दबाए थे। वुफत्तों
का यह जुलूस शेर वेफ मुँह की तरप़्
ाफ बढ़ रहा था। मैंने चीखकर वुफत्तों को रोकना चाहा, पर वे नहीं
रुवेफ और उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी। वे सीधे शेर वेफ मुँह में चले गए।
वुफछ दिनों वेफ बाद मैंने सुना कि शेर अ¯हसा और सह-अस्तित्ववाद का बड़ा शबरदस्त समर्थक
है इसलिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं करता। मैं सोचने लगा, शायद शेर वेफ पेट में वे सारी
चीशें हैं जिनवेफ लिए लोग वहाँ जाते हैं और मैं भी एक दिन शेर वेफ पास गया। शेर आंँखें बंद किए
पड़ा था और उसका स्टाप़्
ाफ आप़्ि
ाफस का काम निपटा रहा था। मैंने वहाँ पूछा, फ्क्या यह सच है कि
शेर साहब वेफ पेट वेफ अंदर, रोशगार का दफ्ऱ तर है?य्
बताया गया कि यह सच है।

Chapter 17 – असगर वजाहत

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