भीष्म साहनी | bhishma sahni | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

भीष्म साहनी
;सन् 1915-2003द्ध
भीष्म साहनी का जन्म रावल¯पडी ;अब पाकिस्तानद्ध में हुआ।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर में ही हुई। इन्होंने उर्दू और अंग्रेशी का
अध्ययन स्वूफल में किया। गवर्नमेंट कालेज लाहौर से आपने
अंग्रेशी साहित्य में एम.ए. किया, तदुपरांत पंजाब विश्वविद्यालय
से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
देश-विभाजन से पूर्व इन्होंने व्यापार वेफ साथ-साथ मानद ;आॅनरेरीद्ध अध्यापन का कार्य किया।
विभाजन वेफ बाद पत्राकारिता, इप्टा नाटक मंडली में काम किया, मुंबई में बेरोशगार भी रहे। पिफर
अंबाला वेफ एक काॅलेज में तथा खालसा काॅलेज, अमृतसर में अध्यापन से जुड़े। वुफछ समय बाद
स्थायी रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय वेफ जाकिर हुसैन काॅलेज में साहित्य का अध्यापन किया। लगभग
सात वर्ष विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक वेफ पद पर भी कार्यरत रहे। रूस प्रवास
वेफ दौरान रूसी भाषा का अध्ययन और लगभग दो दर्शन रूसी पुस्तकों का अनुवाद उनकी विशेष
उपलब्धि रही। लगभग ढाई वर्षों तक नयी कहानियाँ का वुफशल संपादन किया। ये प्रगतिशील लेखक
संघ तथा अप्रफो-एशियाई लेखक संघ से भी संब( रहे।
उनकी प्रमुख कृतियों में भाग्यरेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, वाघ्चू, शोभायात्रा,
निशाचर, पाली, डायन ;कहानी-संग्रहद्ध, झरोखे, कड़ियाँ, तमस, बसंती, मÕयादास की माड़ी,
वुंफतो, नीलू नीलिमा नीलोपफर ;उपन्यासद्ध, माधवी, हानूश, कबिरा खड़ा बशार में, मुआवशे
;नाटकद्ध, गुलेल का खेल ;बालोपयोगी कहानियाँद्ध आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
तमस उपन्यास वेफ लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनवेफ
साहित्यिक अवदान वेफ लिए ¯हदी अकादमी, दिल्ली ने उन्हें शलाका सम्मान से सम्मानित किया।
उनकी भाषा में उर्दू शब्दों का प्रयोग विषय को आत्मीयता प्रदान करता है। उनकी भाषा-शैली में
पंजाबी भाषा की सोंधी महक भी महसूस की जा सकती है। साहनी जी छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग
करवेफ विषय को प्रभावी एवं रोचक बना देते हैं। संवादों का प्रयोग वर्णन में ताशगी ला देता है।

गांधी, नेहरू और यास्सेर अराप्

ाफात उनकी आत्मकथा आज वेफ अतीत का एक अंश है
जोकि एक संस्मरण है। इसमें लेखक ने किशोरावस्था से प्रौढ़ावस्था तक वेफ अपने अनुभवों को
स्मृति वेफ आधार पर शब्दब( किया है। सेवाग्राम में गांधी जी का सान्निध्य, काश्मीर में
जवाहरलाल नेहरू का साथ तथा प़्ि
ाफलिस्तीन में यास्सेर अराप़्
ाफात वेफ साथ व्यतीत किए गए चंद
क्षणों को उन्होंने प्रभावशाली शब्द चित्रों वेफ माध्यम से प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत संस्मरण अत्यंत
रोचक, सरस एवं पठनीय बन पड़ा है क्योंकि भीष्म साहनी ने अपने रोचक अनुभवों को
बीच-बीच में जोड़ दिया है। इस पाठ वेफ माध्यम से रचनाकार वेफ व्यक्तित्व वेफ अतिरिक्त
राष्ट्रीयता, देशप्रेम और अंतरराष्ट्रीय मैत्राी जैसे मुद्दे भी पाठक वेफ सामने उजागर हो जाते हैं।

गांधी, नेहरू और यास्सेर अराप्
़ाफात
उन दिनों मेरे भाई बलराज, सेवाग्राम में रहते थे, जहाँ वह ‘नयी तालीम’ पत्रिका वेफ सह-संपादक
वेफ रूप में काम कर रहे थे। यह सन् 1938 वेफ आसपास की बात है, जिस साल कांग्रेस का हरिपुरा
अधिवेशन हुआ था। वुफछ दिन उनवेफ साथ बिता पाने वेफ लिए मैं उनवेफ पास चला गया था।
रेलगाड़ी वर्धा स्टेशन पर रुकती थी। वहाँ से लगभग पाँच मील दूर सेवाग्राम तक का प़्
ाफासला
इक्वेफ या ताँगे में बैठकर तय करना होता था। मैं देर रात सेवाग्राम पहुँचा। एक तो सड़क कच्ची
थी, इस पर घुप्प अँधेरा था। उन दिनों सड़क पर कोई रोशनी नहीं हुआ
करती थी।
रात देर तक हम बतियाते रहे। भाई ने बताया कि गांधी जी
प्रातः सात बजे घूमने निकलते हैं।
फ्इधर, हमारे क्वार्टर वेफ सामने से ही वह जाएँगे।
कोई भी उनवेफ साथ जा सकता है। तुम भी मन आए तो
चले जाना,य् मैं सवुफचाया।
फ्मैं अवेफला उनकी पार्टी वेफ साथ वैफसे जा
मिलूँ? तुम भी साथ चलो।य्
फ्मैं तो रोश ही उन्हें देखता हूँय्, भाई ने करवट
बदलते हुए कहा, पिफर बोला, फ्अच्छा चलूँगा।य्
दूसरे दिन मैं तड़वेफ ही उठ बैठा, और कच्ची सड़क पर
आँखें गाड़े गांधी जी की राह देखने लगा।
ऐन सात बजे, आश्रम का पफाटक लाँघकर गांधी जी अपने साथियों वेफ साथ सड़क पर आ गए
थे। उन पर नशर पड़ते ही मैं पुलक उठा। गांधी जी हू-ब-हू वैसे ही लग रहे थे जैसा उन्हें चित्रों
में देखा था, यहाँ तक कि कमर वेफ नीचे से लटकती घड़ी भी परिचित-सी लगी।
बलराज अभी भी बेसुध सो रहे थे। हम रात देर तक बातें करते रहे थे। मैं उतावला हो रहा
था। आखिर मुझसे न रहा गया और मैंने ¯झझोड़कर उसे जगाया।

फ्उठो, यार, गांधी जी तो आगे भी निकल गए।य्
फ्मैंने तो कहा था तुम अपने आप चले जाना,य् बलराज, आँखंे मलते हुए उठ बैठे।
फ्मैं अवेफला वैफसे जाता?य्
जिस समय हम बाहर निकले, गांधी जी की पार्टी काप़्
ाफी दूर जा चुकी थी।
फ्¯चता नहीं करो, हम उनसे जा मिलेंगे और वापसी पर तो उनवेफ साथ ही होंगे।य्
आखिर, हम वफदम बढ़ाते वुफछ ही देर में उनसे जा मिले। गांधी जी ने मुड़कर देखा। भाई ने आगे
बढ़कर मेरा परिचय करायाµ
फ्मेरा भाई है, कल ही रात पहुँचा है।य्
फ्अच्छा। इसे भी घेर लिया,य् गांधी जी ने हँसकर कहा।
फ्नहीं बापू, यह वेफवल वुफछ दिन वेफ लिए मेरे पास आया है।य्
गांधी जी ने मुसवुफराकर मेरी ओर देखा और सिर हिला दिया।
मैं साथ चलने लगा। गांधी जी वेफ साथ चलनेवाले लोगों में से मैंने दो-एक को पहचान लिया।
डाॅ. सुशीला नÕयर थीं और गांधी जी वेफ निजी सचिव महादेव देसाई थे। मैं कभी आसपास देखता,
कभी नशर नीची किए शमीन की ओर, गांधी जी की धूलभरी चप्पलों की ओर देखने लगता। मैं
गांधी जी से बात करना चाहता था पर समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। पिफर सहसा ही
मुझे सूझ गया।
फ्आप बहुत साल पहले हमारे शहर रावल¯पडी में आए थे,य् मैंने कहा।
गांधी जी रुक गए, उन्होंने मेरी ओर देखा, उनकी आँखों में चमक-सी आई और मुसवुफराकर बोलेµ
फ्याद है। मैं कोहाट से रावलपिंडी गया था… मिस्टर जाॅन वैफसे हैं?य्
मैंने जाॅन साहब का नाम सुन रखा था। वे हमारे शहर वेफ जाने-माने बैरिस्टर थे, मुस्लिम सज्जन
थे। संभवतः गांधी जी उनवेफ यहाँ ठहरे होंगे।
पिफर सहसा ही गांधी जी वेफ मुँह से निकलाµ
फ्अरे, मैं उन दिनों कितना काम कर लेता था। कभी थकता ही नहीं था।…य् हमसे थोड़ा ही पीछे,
महादेव देसाई, मोटा सा लऋ उठाए चले आ रहे थे। कोहाट और रावल¯पडी का नाम सुनते ही आगे
बढ़ आए और उस दौरे से जुड़ी अपनी यादें सुनाने लगे। और एक बार जो सुनाना शुरू किया तो
आश्रम वेफ पफाटक तक सुनाते चले गए।
किसी-किसी वक्त गांधी जी, बीच में, हँसते हुए वुफछ कहते। वे बहुत धीमी आवाश में बोलते
थे, लगता अपने आपसे बातें कर रहे हैं, अपने साथ ही विचार विनिमय कर रहे हैं। उन दिनों को
स्वयं भी याद करने लगे हैं।
शीघ्र ही वे सब आश्रम वेफ अंदर जा रहे थे।

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