रामविलास शर्मा | Ram Vilas Sharma | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

रामविलास शर्मा
सन् 1912-2000
रामविलास शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश वेफ उन्नाव शिले वेफ
उँफचगाँव-सानी गाँव में हुआ था। उन्होंने लखनउफ विश्वविद्यालय
से अंग्रेशी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाध् िप्राप्त
की। पीएच.डी. करने वेफ उपरांत उन्होंने लखनउफ विश्वविद्यालय
में ही वुफछ समय तक अंग्रेशी विभाग में अध्यापन कार्य किया। सन् 1943 से 1971 तक वे आगरा
वेफ बलवंत राजपूत कालेज मंे अंग्रेशी वेफ प्राध्यापक रहे। 1971 वेफ बाद वुफछ समय तक वे आगरा
वेफ ही वेफ.एम. मुंशी विद्यापीठ वेफ निदेशक रहे। जीवन वेफ आखिरी वर्षों में वे दिल्ली में रहकर
साहित्य समाज और इतिहास से संबंध्ति ¯चतन और लेखन करते रहे और यहीं उनका देहावसान हुआ।
रामविलास शर्मा आलोचक, भाषाशास्त्राी, समाज¯चतक और इतिहासवेत्ता रहे हैं। साहित्य वेफ क्षेत्रा
में उन्होंने कवि और आलोचक वेफ रूप मंे पदार्पण किया। उनकी वुफछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित
तार सप्तक में संकलित हैं। ¯हदी की प्रगतिशील आलोचना को सुव्यवस्थित करने और उसे नयी
दिशा देने का महत्त्वपूर्ण काम उन्होंने किया। उनवेफ साहित्य-¯चतन वेफ वेंफद्र में भारतीय समाज का
जनजीवन, उसकी समस्याएँ और उसकी आकांक्षाएँ रही हंै। उन्होंने वाल्मीकि, कालिदास और
भवभूति वेफ काव्य का नया मूल्यांकन और तुलसीदास वेफ महत्त्व का विवेचन भी किया है।
रामविलास शर्मा ने आध्ुनिक ¯हदी साहित्य का विवेचन और मूल्यांकन करते हुए ¯हदी की
प्रगतिशील आलोचना का मार्गदर्शन किया। अपने जीवन वेफ आखिरी दिनों में वे भारतीय समाज,
संस्कृति और इतिहास की समस्याओं पर गंभीर ¯चतन और लेखन करते हुए वर्तमान भारतीय समाज
की समस्याओं को समझने वेफ लिए, अतीत की विवेक-यात्रा करते रहे।
महत्त्वपूर्ण विचारक और आलोचक वेफ साथ-साथ रामविलास जी एक सपफल निबंध्कार भी हैं।
उनवेफ अध्किांश निबंध् विराम चिर् िंनाम की पुस्तक में संगृहीत हैं। उन्होंने विचारप्रधन और
व्यक्ति व्यंजक निबंधें की रचना की है। प्रायः उनवेफ निबंधें में विचार और भाषा वेफ स्तर पर एक
रचनाकार की जीवंतता और सहृदयता मिलती है। स्पष्ट कथन, विचार की गंभीरता और भाषा की
सहजता उनकी निबंध्-शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

रामविलास शर्मा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। निराला की साहित्य साध्ना
पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों में सोवियत
भूमि नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार का भारत-भारती पुरस्कार, व्यास सम्मान और ¯हदी
अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान उल्लेखनीय है। पुरस्कारांे वेफ प्रसंग में शर्मा जी वेफ आचरण
की एक बात महत्त्वपूर्ण है कि वे पुरस्कारों वेफ माध्यम से प्राप्त होने वाले सम्मान को तो स्वीकार
करते थे लेकिन पुरस्कार की राशि को लोकहित में व्यय करने वेफ लिए लौटा देते थे। उनकी इच्छा
थी कि यह राशि जनता को शिक्षित करने वेफ लिए खर्च की जाए।
उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैंµभारतेंदु और उनका युग, महावीरप्रसाद द्विवेदी और ¯हदी
नवजागरण, प्रेमचंद और उनका युग, निराला की साहित्य साध्ना ;तीन खंडद्ध, भारत वेफ
प्राचीन भाषा परिवार और ¯हदी ;तीन खंडद्ध, भाषा और समाज, भारत में अंग्रेशी राज और
माक्र्सवाद, इतिहास दर्शन, भारतीय संस्कृति और ¯हदी प्रदेश आदि।
यथास्मै रोचते विश्वम् नामक निबंध उनवेफ निबंध संग्रह विराम चिर् िंसे लिया गया है। इसमें
उन्होंने कवि की तुलना प्रजापति से करते हुए उसे उसवेफ कर्म वेफ प्रति सचेत किया है। लेखक
वेफ अनुसार साहित्य जहाँ एक ओर मनुष्य को मानसिक विश्रांति प्रदान करता है वहीं उसे
उन्नति वेफ मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा भी देता है। सामाजिक प्रतिब(ता साहित्य की
कसौटी है। पंद्रहवीं शताब्दी से आज तक वेफ साहित्य वेफ अध्ययन-मूल्यांकन वेफ लिए
रामविलास जी ने इसी जनवादी साहित्य चेतना को मान्यता दी है।

यथास्मै रोचते विश्वम्
प्रजापति से कवि की तुलना करते हुए किसी ने बहुत ठीक लिखा थाµफ्यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं
परिवर्तते।य् कवि को जैसे रुचता है वैसे ही संसार को बदल देता है।
यदि साहित्य समाज का दर्पण होता तो संसार को बदलने की बात न उठती। कवि का काम
यथार्थ जीवन को प्रति¯बबित करना ही होता तो वह प्रजापति का दर्जा न पाता। वास्तव में प्रजापति
ने जो समाज बनाया है, उससे असंतुष्ट होकर नया समाज बनाना कविता का जन्मसि( अधिकार
है। यूनानी विद्वानों वेफ बारे में कहा जाता है कि वे कला को जीवन की नकल समझते थे और
अप़्
ाफलातून ने असार संसार को असल की नकल बताकर कला को नकल की नकल कहा था।
लेकिन अरस्तू ने ट्रेजेडी वेफ लिए जब कहा था कि उसमें मनुष्य जैसे हैं उससे बढ़कर दिखाए जाते
हैं, तब नकल-नवीस कला का खंडन हो गया था और जब वाल्मीकि ने अपने चरित्रा-नायक वेफ
गुण गिनाकर नारद से पूछा कि ऐसा मनुष्य कौन है? तब नारद ने पहले यही कहाµफ्बहवो
दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः।य् दुर्लभ गुणों को एक ही पात्रा में दिखाकर आदि कवि ने समाज
को दर्पण में प्रति¯बबित न किया था वरन् प्रजापति की तरह नयी सृष्टि की थी।
कवि की यह सृष्टि निराधार नहीं होती। हम उसमें अपनी ज्यों की त्यों आकृति भले ही न देखें
पर ऐसी आकृति शरूर देखते हैं जैसी हमें प्रिय है, जैसी आकृति हम बनाना चाहते हैं। जिन रेखाओं
और रंगों से कवि चित्रा बनाता है, वे उसवेफ चारों ओर यथार्थ जीवन में बिखरे होते हैं और चमकीले
रंग और सुघर रूप ही नहीं, चित्रा वेफ पाश्र्व भाग में काली छायाएँ भी वह यथार्थ जीवन से ही लेता
है। राम वेफ साथ वह रावण का चित्रा न खींचें तो गुणवान, वीर्यवान, कृतज्ञ, सत्यवाक्य, दृढ़व्रत,
चरित्रावान, दयावान, विद्वान, समर्थ और प्रियदर्शन नायक का चरित्रा पफीका हो जाए और वास्तव में
उसवेफ गुणों वेफ प्रकाशित होने का अवसर ही न आए

Chapter 19 – रामविलास शर्मा

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