ब्रजमोहन व्यास | Brajmohan Vyas | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

ब्रजमोहन व्यास

सन् 1886-1963

ब्रजमोहन व्यास का जन्म इलाहाबाद में हुआ। पं. गंगानाथ झा और पं. बालकृष्ण भ‘ से उन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। व्यास जी सन् 1921 से 1943 तक इलाहाबाद नगरपालिका वेफ कार्यपालक अधिकारी रहे। सन् 1944 से 1951 वेफ लीडर समाचारपत्रा समूह वेफ जनरल मैनेजर रहे। 23 मार्च 1963 को इलाहाबाद में ही उनका देहावसान हुआ। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैंµजानकी हरण ;वुफमारदास कृतद्ध का अनुवाद, पं. बालकृष्ण भ‘ ;जीवनीद्ध, महामना मदन मोहन मालवीय ;जीवनीद्ध। मेरा कच्चा चिऋा उनकी आत्मकथा है। व्यास जी की सबसे बड़ी देन इलाहाबाद का विशाल और प्रसि( संग्रहालय है जिसमें दो हशारपाषाण मूर्तियाँ, पाँच-छह हशार मृणमूर्तियाँ, कनिष्क वेफ राज्यकाल की प्राचीनतम बौ( मूर्ति, खजुराहो की चंदेल प्रतिमाएँ, सैकड़ों रंगीन चित्रों का संग्रह आदि शामिल है। उन्होंने संस्कृत,¯हदी और अरबी-प़्ाफारसी वेफ चैदह हशार हस्तलिखित गं्रथों का संकलन उसी संग्रहालय हेतु किया। पं. नेहरू को मिले मानपत्रा, चंद्रशेखर आशाद की पिस्तौल इलाहाबाद संग्रहालय कीधरोहर मानी जाती है।पुरातत्व संबंधी संग्रहालय की विभिन्न धरोहर-सामग्री का संकलन बगैर विशेष व्यय वेफ कर पाना ब्रजमोहन व्यास का अपना विशिष्ट कौशल है। प्रस्तुत पाठ उनवेफ श्रम-कौशल और मेधा कार्य का ‘कच्चा चिऋा’ है।

कच्चा चिऋा

सन् 1936 वेफ लगभग की बात है। मैं पूर्वव्रफमानुसार

कौशाम्बी गया हुआ था। वहाँ का काम निबटाकर

सोचा कि दिनभर वेफ लिए पसोवा हो आउँफ। ढाई मील

तो हई है। सौभाग्य से गाँव में कोई सवारी इक्वेफ पर आई

थी। उस इक्वेफ को ठीक कर लिया और पसोवे वेफ लिए रवाना

हो गया। कील-काँटे से दुरस्त था। पसोवा एक बड़ा जैन तीर्थ है।

वहाँ प्राचीन काल से प्रतिवर्ष जैनों का एक बड़ा मेला लगता है जिसमें

दूर-दूर से हशारों जैन यात्राी आकर सम्मिलित होते हैं। यह भी कहा जाता

है कि इसी स्थान पर एक छोटी-सी पहाड़ी थी जिसकी गुपफा में बु(देव

व्यायाम करते थे। वहाँ एक विषधर सर्प भी रहता था।

यह भी ¯वफवदंती है कि इसी वेफ सन्निकट सम्राट अशोक ने एक स्तूप

बनवाया था जिसमें

बु( वेफ थोड़े से वेफश

और नखखंड रखे गए

थे। पसोवे में स्तूप और

व्यायामशाला वेफ तो

कोई चिर् िंअब शेष

नहीं रह गए, परंतु

वहाँ एक पहाड़ी

अवश्य है। ‘निवेशः

शैलानां तदिदमिति बु(िं

दृढ़यति’µ;भवभूतिद्ध।

पहाड़ी का होना इंगित

करता है कि यह स्थान

वही है।

मैं कहीं जाता हूँ तो छूँछे हाथ नहीं लौटता। यहाँ कोई विशेष महत्त्व की चीश तो नहीं मिली

पर गाँव वेफ भीतर वुफछ बढ़िया मृण्मूर्तियाँ, सिक्वेफ और मनवेफ मिल गए। इक्वेफ पर कौशाम्बी लौटा।

एक दूसरे रास्ते से। एक छोटे-से गाँव वेफ निकट पत्थरों वेफ ढेर वेफ बीच, पेड़ वेफ नीचे, एक चतुर्मुख

शिव की मूर्ति देखी। वह वैसे ही पेड़ वेफ सहारे रखी थी जैसे उठाने वेफ लिए मुझे ललचा रही हो।

अब आप ही बताइए, मैं करता ही क्या? यदि चांद्रायण व्रत करती हुई बिल्ली वेफ सामने एक चूहा

स्वयं आ जाए तो बेचारी को अपना कर्तव्य पालन करना ही पड़ता है। इक्वेफ से उतरकर इधर-उधर

देखते हुए उसे चुपचाप इक्वेफ पर रख लिया। 20 सेर वशन में रही होगी। ‘न वूफवुफर भूँका, न पहरू

जागा।’ मूर्ति अच्छी थी। पसोवे से थोड़ी सी चीशों वेफ मिलने की कमी इसने पूरी कर दी। उसे लाकर

नगरपालिका में संग्रहालय से संबंधित एक मंडप वेफ नीचे अन्य मूर्तियों वेफ साथ रख दिया।

उसवेफ थोड़े ही दिन बाद गाँववालों को पता चल गया कि चतुर्मुख शिव वहाँ से अंतर्धान हो गए।

जिस प्रकार भरतपुर राज्य की सीमा पर डवैफती होने से पुलिस का ध्यान मान¯सह अथवा उसवेफ सुपुत्रा

तहसीलदार पर सहसा जाता है, वुफछ उसी प्रकार कौशाम्बी मंडल से कोई मूर्ति स्थानांतरित होने पर

गाँववालों का संदेह मुझपर होता था। और वैफसे न हो? ‘अपना सोना खोटा तो परखवैया का कौन

दोस?’ मैं इस संबंध में इतना प्रख्यात हो चुका था कि संदेह होना स्वाभाविक ही था, क्योंकि

95 प्रतिशत उनका संदेह सही निकलता था। एक दिन की बात है कि मैं अपने दफ्र

़ तर में बैठा काम

कर रहा था।

चपरासी ने आकर इत्तिला की कि पसोवे वेफ निकटस्थ एक गाँव से 15-20 आदमी मुझसे मिलने

आए हैं। चोर की दाढ़ी में तिनका। मेरा माथा ठनका। मैंने उन सबको कमरे में ही बुलवा लिया। कमरा

भर गया। उसमें बुइ़े, जवान, स्त्रिायाँ, बच्चे सभी थे। संभव है, धर्म पर आघात समझकर आसपास वेफ

गाँव वेफ भी वुफछ लोग साथ में चले आए हों।

मुखिया ने नतमस्तक होकर निवेदन किया, फ्महाराज! ;मेरे मस्तक पर हस्बमामूल चंदन थाद्ध जब

से शंकर भगवान हम लोगन क छोड़ वेफ हियाँ चले आए, गाँव भर पानी नै पिहिस। अउर तब तक

न पी जब तक भगवान गाँव न चलिहैं। अब हम लोगन क प्रान आपै वेफ हाथ में हैं। आप हुवुफम देओ

तो हम भगवान को लेवाए जाइ।य् यदि मुझे मालूम होता कि गाँववालों को उन पर इतनी ममता है

तो उन्हें कभी न लाता। मैंने तुरंत कहा, फ्आप उन्हें प्रसन्नता से ले जाएँ।य् सब लोग बड़े प्रसन्न हुए।

मैंने स्वयं शेड पर जाकर भगवान शंकर को उनवेफ हवाले कर दिया। स्त्राी-पुरुष सब उनवेफ सामने बैठ

गए। स्त्रिायों ने गाना आरंभ कर दिया। मैंने मिठाई और जल मँगाकर उन लोगों का उपवास तुड़वाया।

दूर से दफ्र

़ तर वाले अपने अप़्

ाफसर की करतूत देखकर मुसकरा रहे थे। मैंने उस मूर्ति को अपनी मोटर

पर रख लिया और उनवेफ दो-तीन आदमियों को साथ लेकर लारी वेफ अंे पर पहुँचा और मूर्ति को

सम्मान सहित विदा किया। गाँववालों पर इसका बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। मुझे भविष्य का भी तो

खयाल था।

यह रवैया मेरा बराबर जारी रहा। उसी वर्ष या संभवतः उसवेफ दूसरे वर्ष, मैं पिफर कौशाम्बी गया
और गाँव-गाँव, नाले-खोले घूमता-पिफरता झख मारता रहा। भला यह कितने दिन ऐसे चल सकता,
अगर बीच-बीच में छठे-छमासे कोई चीश इतनी महत्त्वपूर्ण न मिल जाती जिससे दिल पफड़क उठता?
बराबर यही सोचता कि फ्ना जाने वेफहि भेष में नारायण मिल जाएँ।य् और यही एक दिन हुआ। खेतों
की डाँड़-डाँड़ जा रहा था कि एक खेत की मेड़ पर बोधिसत्व की आठ पुफट लंबी एक सुंदर मूर्ति
पड़ी देखी। मथुरा वेफ लाल पत्थर की थी। सिवाए सिर वेफ पदस्थल तक वह संपूर्ण थी। मैं लौटकर
पाँच-छह आदमी और लटकाने का सामान गाँव से लेकर पिफर लौटा। जैसे ही उस मूर्ति को मैं उठवाने
लगा वैसे ही एक बुढ़िया जो खेत निरा रही थी, तमककर आई और कहने लगी, फ्बड़े चले हैं मूरत
उठावै। ई हमार है। हम न देबै। दुइ दिन हमार हर रुका रहा तब हम इनका निकरवावा है। ई नकसान
कउन भरी?य् मैं समझ गया। बात यह है कि मैं उस समय भले आदमी की तरह वुफरता धोती में था।
इसलिए उसे इस तरह बोलने की हिम्मत पड़ी। सोचा कि बुढ़िया वेफ मुँह लगना ठीक नहीं।
संस्वृफत-साहित्य का वचन याद आयाµ
उद्वेजयति दरिद्रं परमुद्रायाः झणत्कारम्।
दूसरे की मुद्रा की झनझनाहट गरीब आदमी वेफ हृदय में उत्तेजना उत्पन्न करती है। उसी का आश्रय
लिया। मैंने अपने जेब में पड़े हुए रुपयों को ठनठनाया। मैं ऐसी जगहों में नोट-वोट लेकर नहीं जाता।
वेफवल ठनठनाता। उसकी बात ही और होती है। मैंने कहा, फ्ठीवैफ तो कहत हौ बुढ़िया। ई दुई रुपया
लेओ। तुम्हार नुकसानौ पूर होए जाई! ई हियाँ पड़े अंडसै करिहैं। न डेहरी लायक न बँडेरी लायक।य्
बुढ़िया को बात समझ में आ गई और जब रुपया हाथ में आ गया तो बोली, फ्भइया! हम मने नाहीं
करित। तुम लै जाव।य्
आज दिन वह मूर्ति प्रयाग संग्रहालय में प्रदर्शित है। जब यह संग्रहालय नगरपालिका वेफ दफ्ऱ तर वेफ
एक विशाल अंग में था, एक प्रफांसीसी उसे देखने आया। मैंने बड़े उत्साह से उसे संपूर्ण संग्रहालय
दिखलाया। बाद में पता चला कि वह प्रफांस का एक बड़ा डीलर है जो ¯हदुस्तान तथा अन्य जगहों
से चीशें खरीदता पिफरता है। मैं पहिले वैफसे समझ पाता।
काकः वृफष्णः पिकः वृफष्णः को भेद पिककाकयोः।
प्राप्ते वसन्तसमये काकः काकः पिकः पिकः।।
कौवा भी काला होता है, कोयल भी काली होती है। दोनों में भेद ही क्या है। परंतु वसंत )तु
वेफ आते ही पता चल जाता है कि कौन कौवा है और कौन कोयल। संग्रहालय को देखकर बोला,
फ्बहुत कीमती संग्रह!य् मैंने पूछा कि कीमती से आपका क्या तात्पर्य है। रुपयों में बतावें तो समझ
में आवे। हँसकर बोला, फ्रुपयों में बता दूँ तो आपका ईमान डिग जाए।य् वैसे ही हँसकर मैंने जवाब
दिया कि फ्ईमान! ऐसी कोई चीश मेरे पास हई नहीं तो उसवेफ डिगने का कोई सवाल नहीं उठता।
यदि होता तो इतना बड़ा संग्रह बिना पैसा-कौड़ी वेफ हो ही नहीं सकता।य्
उस बोधिसत्व की ओर इशारा कर वह तुरंत बोल उठा, फ्आप उस मूर्ति को मेरे हाथ दस हशार
रुपए में बेचेंगे? इतने रुपए में तो आपको बहुत सी मूर्तियाँ मिल जाएँगी।य् इस मूर्ति का चित्रा और
उसका वर्णन विदेशी पत्रों में छप चुका था। अवश्य ही इस प्रफांसीसी ने उसे पढ़ा होगा। मैंने अपनी
तबीयत में कहा, फ्यह एक ही रही।य् प्रफांसीसी महोदय ने मेरी आवृफति से मेरा निर्णय समझ लिया।
बात खत्म हो गई। मूर्ति अब तक संग्रहालय का मस्तक उँफचा कर रही है।
पाठक यह जानने वेफ लिए उत्सुक होंगे कि आखिर इस मूर्ति में कौन सा सुरखाब का पर लगा
था जो दो रुपए में मिली और दस हशार रुपए उसपर न्योछावर कर पेंफवेफ जा रहे हैं। संभव है कि
वे सोचते हों कि मूर्ति में तो वेफवल सिर नहीं है, ;परंतु लेखक की बातें उससे भी एक पग आगे
बेसिर पैर की हैं। पर बात ऐसी नहीं है।द्ध यह मूर्ति उन बोधिसत्व की मूर्तियों में है जो अब तक संसार
में पाई गई मूर्तियों में सबसे पुरानी है। यह वुफषाण सम्राट कनिष्क वेफ राज्यकाल वेफ दूसरे वर्ष स्थापित
की गई थी। ऐसा लेख उस मूर्ति वेफ पदस्थल पर उत्कीर्ण है। इस शेर वेफ मार लेने से मेरा दिल दूना
हो गया और नए सिरे से पिफर मुँह में खून लग गया। शेर तो रोश मिलता नहीं पर चीतल, साँभर तो
हर बार मिलते ही रहते हैं। शेर की वेफवल आशा मात्रा रहती है। परंतु इसी आशा से शिकार अनुप्राणित
रहता है और शिकारी जंगल-जंगल की खाक छानता पिफरता है।
सन् 1938 वेफ लगभग की बात है। गवर्नमेंट आॅपफ इंडिया का पुरातत्व विभाग कौशाम्बी में
श्री मजूमदार की देखरेख में खुदाई कर रहा था। उस समय श्री वेफ. एन. दीक्षित डायरेक्टर-जनरल थे।
मेरे परम मित्रा थे। उन्हें प्रयाग संग्रहालय से बड़ी सहानुभूति थी और सदा उसकी सहायता करने वेफ
लिए प्रस्तुत रहते थे। साधु प्रवृफति तो थे ही, परंतु आखिर बड़े हाकिम ठहरे, रोब था, शमाने वेफ
अभ्यस्त थे। खुदाई वेफ प्रसंग में मजूमदार साहब को पता चला कि कौशाम्बी से चार-पाँच मील दूर
एक गाँव हजियापुर है। वहाँ किसी व्यक्ति वेफ यहाँ भद्रमथ का एक भारी शिलालेख है। श्री मजूमदार
उसे उठवा ले जाना चाहते थे।
गाँव वेफ एक शमींदार गुलशार मियाँ ने, जिनका गाँव में दबादबा था, एतराश किया। गुलशार मियाँ
हमारे भक्त थे और मैं भी उन्हें बहुत मानता था, यद्यपि उनकी भक्ति और मेरा मानना दोनों स्वार्थ से
खाली नहीं थे। मैंने उनवेफ भाई दिलदार मियाँ को म्युनिसिपैलिटी में चपरासी की नौकरी दे दी थी और
उन लोगों की हर तरह से सहायता करता था। वे मुझे आसपास वेफ गाँवों से पाषाण-मूर्तियाँ, शिलालेख
इत्यादि देते रहते थे। मजूमदार साहब ने जब उसे शबरदस्ती उठवाना चाहा तो वे लोग प़्
ाफौजदारी पर
आमादा हो गए। बोले, फ्यह इलाहाबाद वेफ अजायबघर वेफ हाथ 25 रुपए का बिक चुका है, अगर बिना
व्यास जी वेफ पूछे इसे कोई उठावेगा तो उसका हाथ-पैर तोड़ देंगे।य् मजूमदार साहब ने पच्छिम सरीरा
वेफ थाने में रपट की पर किसी की वुफछ नहीं चली। गुलशार मियाँ ने उस शिलालेख को नहीं दिया।
मजूमदार साहब ने इस सबकी रिपोर्ट नोन-मिर्च लगाकर दीक्षित साहब को दिल्ली लिख भेजी। दीक्षित
साहब की साधु प्रवृफति वेफ भीतर जो हाकिम पड़ा था, उसने करवट ली।
एक दिन दीक्षित साहब का अर्धसरकारी पत्रा मुझे मिला जिसका आशय यह था, फ्कौशाम्बी से
मेरे पास रिपोर्ट आई है कि आपवेफ उकसाने वेफ कारण शमींदार गुलशार मियाँ भद्रमथ वेफ एक
शिलालेख को देने में आपत्ति करता है और आमादा प़्
ाफौजदारी है। मैं इस मामले को बढ़ाना नहीं चाहता
परंतु यह कहे बिना रह भी नहीं सकता कि सरकारी काम में आपका यह हस्तक्षेप अनुचित है।य् खैर,
यहाँ तक तो खून का घूँट किसी तरह पिया जा सकता था पर इसवेफ आगे उन्होंने लिखा, फ्यदि यही
आपका रवैया रहा तो यह विभाग आपवेफ कामों में वह सहानुभूति न रखेगा जो उसने अब तक बराबर
रखी है।य्
एक मित्रा से ऐसा पत्रा पाकर मेरे बदन में आग लग गई। मैं सबवुफछ सहन कर सकता हूँ पर किसी
की भी अकड़ बर्दाश्त नहीं कर सकता। आग्नेय अस्त्रा से मेरे बदन में आग लग जाती है। वरुणास्त्रा
से पानी-पानी हो जाता हूँ। मैंने तुरंत दीक्षित जी को उत्तर दिया, जो थोड़े में इस प्रकार था, फ्मैं आपवेफ
पत्रा एवं उसकी ध्वनि का घोर प्रतिवाद करता हूँ। उसमें जो वुफछ मेरे संबंध में लिखा गया है, वह
नितांत असत्य है। मैंने किसी को नहीं उकसाया। मैं आपसे स्पष्ट रूप से कह देना चाहता हूँ कि
आपवेफ विभाग की सहानुभूति चाहे रहे या न रहे, प्रयाग संग्रहालय की उत्तरोत्तर वृ(ि होती रहेगी।
प्रयाग संग्रहालय ने इस भद्रमथ वेफ शिलालेख को 25 रुपए का खरीदा है। पर आपवेफ विभाग से,
विशेषकर आपवेफ होते हुए, झगड़ना नहीं चाहता। इसलिए यदि आप उसे लेना चाहते हैं तो 25 रुपए
देकर ले लें, मैं गुलशार को लिख दूँगा।य् इसवेफ उत्तर में उनका एक विनम्र पत्रा आया जिसमें उन्होंने
अपने पूर्व पत्रा वेफ लिए खेद प्रगट किया। विभाग की उपेक्षा जो मैंने की थी, उसे पी गए। बात खत्म
हो गई।
बाद में गुलशार ने मुझे बताया कि 25 रुपए लेकर उसने शिलालेख दे दिया। प्रयाग संग्रहालय में
और भी भद्रमथ वेफ शिलालेख थे, कोई क्षति नहीं हुई। गरीब शमींदार को 25 रुपए मिल गए। उसने
मुझे धन्यवाद दिया। मैंने सोचा कि जिस गाँव में भद्रमथ का शिलालेख हो सकता है वहाँ संभव है
और भी शिलालेख हों। अतः मैं हजियापुर, जो कौशाम्बी से वेफवल चार-पाँच मील था, गया और मैंने
गुलशार मियाँ वेफ यहाँ डेरा डाल दिया। उसवेफ भाई को, जो म्युनिसिपैलिटी में नौकर था, साथ ले लिया
था। गुलशार मियाँ वेफ मकान वेफ ठीक सामने उन्हीं का एक निहायत पुख्ता सजीला वुँफआ था। चबूतरे
वेफ उफपर चार पक्वेफ खंभे थे जिनमें एक से दूसरे तक अठपहल पत्थर की बँडेर पानी भरने वेफ लिए
गड़ी हुई थी। सहसा मेरी दृष्टि एक बँडेर पर गई जिसवेफ एक सिरे से दूसरे सिरे तक ब्राह्मी अक्षरों
में एक लेख था।
मेरी तबीयत पफड़क उठी। परंतु सजीले खंभों से खोदकर निकलवाने में हिचक हुई। गुलशार मियांँ
मुझे असमंजस में देख तुरंत बोल उठे, फ्सरकार, अबहिन खोदवाय देइत है। सब आपैक तो है। हम
सबन की देह आपकी पाली है, ई खंभन की कउन बिसात है।य् उन्होंने तुरंत उसे निकलवा कर हमें
दे दिया। भद्रमथ वेफ शिलालेख की क्षति-पूर्ति हो गई।

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