Jai Shankar Prasad 12TH NCERT 2021-22 अध्याय 01 आरोह भाग 02

 

अध्याय 01 – जयशंकर प्रसाद 

;सन् 1889-1937द्ध

जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी में हुआ। वे विद्यालयी शिक्षा

वेफवल आठवीं कक्षा तक प्राप्त कर सवेफ, ¯कतु स्वाध्याय द्वारा

उन्होंने संस्कृत, पालि, उर्दू और अंग्रेशी भाषाओं तथा साहित्य का

गहन अध्ययन किया। इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्रा और पुरातत्त्व वेफ

वे प्रकांड विद्वान थे।

प्रसाद जी अत्यंत सौम्य, शांत एवं गंभीर प्रकृति वेफ व्यक्ति थे। वे पर¯नदा एवं आत्मस्तुति दोनों

से सदा दूर रहते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा वेफ धनी थे। मूलतः वे कवि थे, लेकिन उन्होंने नाटक,

उपन्यास, कहानी, निबंध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में उच्चकोटि की रचनाओं का सृजन किया।

प्रसाद-साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का स्वर प्रमुख है। संपूर्ण साहित्य में विशेषकर नाटकों में

प्राचीन भारतीय संस्कृति वेफ गौरव वेफ माध्यम से प्रसाद जी ने यह काम किया। उनकी कविताओं,

कहानियों में भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की झलक मिलती है। प्रसाद ने कविता वेफ साथ

नाटक, उपन्यास, कहानी संग्रह, निबंध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य किया है।

उनकी प्रमुख रचनाएँ हैंµअजातशत्राु, स्वंफदगुप्त, चंद्र्रगुप्त, राजश्री, ध्रुवस्वामिनी ;नाटकद्धऋ

वंफकाल, तितली, इरावती ;अपूर्णद्ध ;उपन्यासद्ध, आँधी, इंद्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि और

आकाशदीप ;कहानी संग्रहद्ध, काव्य और कला तथा अन्य निबंध ;निबंध संग्रहद्ध, झरना, आँसू,

लहर, कामायनी, कानन वुफसुम, और प्रेमपथिक ;कविताएँद्ध।

देवसेना का गीत प्रसाद वेफ स्वंफदगुप्त नाटक से लिया गया है। देवसेना मालवा वेफ

राजा बंधुवर्मा की बहन है। हूणों वेफ आक्रमण से आर्यावर्त संकट में है। बंधुवर्मा सहित उस

परिवार वेफ सभी लोगों को वीरगति प्राप्त हुई। बची हुई देवसेना भाई वेफ स्वप्नों को साकार

करने वेफ लिए और राष्ट्रसेवा का व्रत लिए हुए है। जीवन में देवसेना को स्वंफदगुप्त की चाह

थी, ¯कतु स्वंफदगुप्त मालवा वेफ धनवुफबेर की कन्या ;विजयाद्ध का स्वप्न देखते थे। जीवन वेफ

अंतिम मोड़ पर स्वंफदगुप्त देवसेना को पाना चाहता है। ¯कतु देवसेना तब तक वृ( पर्णदत्त वेफ

साथ आश्रम में गाना गाकर भीख माँगती है और महादेवी की समाधि परिष्कृत करती है।

स्वंफदगुप्त वेफ अनुनय-विनय पर जब वह तैयार नहीं होती तो स्वंफदगुप्त आजीवन वुँफवारा रहने

का व्रत ले लेता है। इधर देवसेना कहती हैµफ्हृदय की कोमल कल्पना सो जा! जीवन में

जिसकी संभावना नहीं, जिसे द्वार पर आए हुए लौटा दिया था उसवेफ लिए पुकार मचाना क्या

तेरे लिए अच्छी बात है? आज जीवन वेफ भावी सुख, आशा और आवफांक्षाµसबसे मैं विदा

लेती हूँय्, तब वह गीत गाती हैµआह! वेदना मिली विदाई! देवसेना का गीत कविता में

देवसेना अपने जीवन पर दृष्टिपात करते हुए अपने अनुभवों में अर्जित वेदनामय क्षणों को याद

कर रही है। जीवन वेफ इस मोड़ पर अर्थात् जीवन संध्या की बेला में वह अपने यौवन वेफ

क्रियाकलापों को याद कर रही है। वह अपने यौवन वेफ क्रियाकलापों को भ्रमवश किए गए

कर्मों की श्रेणी में ही रख रही है और उस समय की गई नादानियों वेफ पश्चाताप स्वरूप

उसकी आँखों से आँसू की अजस्र धारा बहती जा रही है। अपने आसपास उसे सबकी प्यासी

निगाहें ही दिखाई पड़ती हैं और वह स्वयं को इनसे बचाने की कोशिश करती है। पिफर भी

जो उसवेफ जीवन की पूँजी है, सारी कमाई है, वह उसे बचा नहीं सकी, यही विडंबना है, यही

वेदना है। प्रलय स्वयं देवसेना वेफ जीवनरथ पर सवार है। वह अपनी द्रुतमान दुर्बलताओं और

हारने की निश्चितता वेफ बावजूद प्रलय से लोहा लेती रही है। गीत वेफ शिल्प में रची गई यह

कविता वेदना वेफ क्षणों में मनुष्य और प्रकृति वेफ संबंधों को भी व्यक्त करती चलती है।

दूसरी कविता कार्नेलिया का गीत प्रसाद वेफ चंद्रगुप्त नाटक का एक प्रसि( गीत है।

कार्नेलिया सिवंफदर वेफ सेनापति सिल्यूकस की बेटी है। ¯सधु वेफ किनारे ग्रीक शिविर वेफ पास

वृक्ष वेफ नीचे बैठी हुई है। कहती हैµफ्¯सधु का यह मनोहर तट जैसे मेरी आँखों वेफ सामने एक

नया चित्रापट उपस्थित कर रहा है। इस वातावरण से धीरे-धीरे उठती हुई प्रशांत स्निग्धता जैसे

हृदय में घुस रही है। लंबी यात्रा करवेफ जैसे मैं वहीं पहुँच गई हूँ जहाँ वेफ लिए चली थी। यह

कितना निसर्ग सुंदर है, कितना रमणीय है? हाँ वह! आज वह भारतीय संगीत का पाठ देखूँ भूल

तो नहीं गई?य् तब वह यह गीत गाती हैµ‘अरफण यह मधुमय देश हमारा!’ इस गीत में हमारे

देश की गौरवगाथा तथा प्राकृतिक सौंदर्य को भारतवर्ष की विशिष्टता और पहचान वेफ रूप में

प्रस्तुत किया गया है। पक्षी भी अपने प्यारे घोंसले की कल्पना कर जिस ओर उड़ते हैं वही यह

प्यारा भारतवर्ष है। अनजान को भी सहारा देना और लहरों को भी किनारा देना हमारे देश की

विशेषता है सही मायने में भारत देश की यही पहचान है।

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Chapter 1 – जयशंकर प्रसाद

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