केदारनाथ सिंह | Kedarnath Singh | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

केदारनाथ सिंह | Kedarnath Singh | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

Chapter 4 

केदारनाथ सिंह का जन्म बलिया शिले वेफ चकिया गाँव में हुआ।

काशी ¯हदू विश्वविद्यालय से ¯हदी में एम.ए. करने वेफ बाद उन्होंने

वहीं से ‘आधुनिक ¯हदी कविता में बिम्ब-विधान’ विषय पर

पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की। वुफछ समय गोरखपुर में ¯हदी वेफ प्राध्यापक रहे पिफर जवाहरलाल नेहरू

विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा वेंफद्र में ¯हदी वेफ प्रोप

फसर वेफ पद से अवकाश प्राप्त किया। संप्रति

दिल्ली में रहकर स्वतंत्रा लेखन कर रहे हैं।

वेफदारनाथ ¯सह मूलतः मानवीय संवेदनाओं वेफ कवि हैं। अपनी कविताओं में उन्होंने ¯बब-विधान

पर अधिक बल दिया है। वेफदारनाथ ¯सह की कविताओं में शोर-शराबा न होकर, विद्रोह का शांत और

संयत स्वर सशक्त रूप में उभरता है। शमीन पक रही है संकलन में शमीन, रोटी, बैल आदि उनकी

इसी प्रकार की कविताएँ हैं। संवेदना और विचारबोध उनकी कविताओं में साथ-साथ चलते हैं।

जीवन वेफ बिना प्रवृफति और वस्तुएँ वुफछ भी नहीं हैंµयह अहसास उन्हें अपनी कविताओं में आदमी

वेफ और समीप ले आया है। इस प्रव्रिफया में वेफदारनाथ ¯सह की भाषा और भी नम्य और पारदर्शी हुई है और

उनमें एक नयी )जुता और बेलौसपन आया है। उनकी कविताओं में रोशमर्रा वेफ जीवन वेफ अनुभव परिचित

¯बबों में बदलते दिखाई देते हैं। शिल्प में बातचीत की सहजता और अपनापन अनायास ही दृष्टिगोचर होता

है। अकाल में सारस कविता संग्रह पर उनको 1989 वेफ साहित्य अकादमी पुरस्कार से और 1994 में

मध्य प्रदेश शासन द्वारा संचालित मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान तथा वुफमारन आशान, व्यास सम्मान,

दयावती मोदी पुरस्कार आदि अन्य कई सम्मानों से भी सम्मानित किया गया है।

अब तक वेफदारनाथ ¯सह वेफ सात काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैंµअभी बिलवुफल अभी, शमीन पक

रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ – बाघ, टालस्टाय और

साईकिल। कल्पना और छायावाद और आध्ुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास उनकी

आलोचनात्मक पुस्तवेंफ हैं। मेरे समय वेफ शब्द तथा कब्रिस्तान में पंचायत निबंध संग्रह हैं। हाल ही में उनकी

चुनी हुई कविताओं का संग्रह प्रतिनिधि कविताएँ नाम से प्रकाशित हुआ है। उनवेफ द्वारा संपादित ताना-बाना

नाम से विविध भारतीय भाषाओं का ¯हदी में अनूदित काव्य संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

बनारस कविता में प्राचीनतम शहर बनारस वेफ सांस्वृफतिक वैभव वेफ साथ ठेठ बनारसीपन पर

भी प्रकाश डाला गया है। बनारस शिव की नगरी और गंगा वेफ साथ विशिष्ट आस्था का वेंफद्र

है। बनारस में गंगा, गंगा वेफ घाट, मंदिर तथा मंदिरों और घाटों वेफ किनारे बैठे भिखारियों वेफ

कटोरे जिनमें वसंत उतरता हैµका चित्रा बनारस कविता में अंकित हुआ है।

इस शहर वेफ साथ मिथकीय आस्थाµकाशी और गंगा वेफ सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा

जुड़ी है। गंगा में बंधी नाव, एक ओर मंदिरों-घाटों पर जलने वाले दीप तो दूसरी तरप़्

ाफ कभी

न बुझने वाली चिताग्नि, उनसे तथा हवन इत्यादि से उठने वाला धुआँµयही तो है बनारस। यहाँ

हर कार्य अपनी ‘रौ’ में होता है। यह बनारस का चरित्रा है। आस्था, श्र(ा, विरक्ति, विश्वास,

आश्चर्य और भक्ति का मिला जुला रूप बनारस है। काशी की अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता

एवं भव्यता वेफ साथ आधुनिकता का समाहार बनारस कविता में मौजूद है। यह कविता एक

पुरातन शहर वेफ रहस्यों को खोलती है, बनारस एक मिथक बन चुका शहर है, इस शहर की

दार्शनिक व्याख्या यह कविता करती है। कविता भाषा संरचना वेफ स्तर पर सरल है और अर्थ

वेफ स्तर पर गहरी। कविता का शिल्प विवरणात्मक होने वेफ साथ ही कवि की सूक्ष्म दृष्टि का

परिचायक है।

दिशा कविता बाल मनोविज्ञान से संबंधित है जिसमें पतंग उड़ाते बच्चे से कवि पूछता है

हिमालय किधर है। बालक का उत्तर बाल सुलभ है कि हिमालय उधर है जिधर उसकी पतंग

भागी जा रही है। हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं।

कवि को यह बाल सुलभ संज्ञान मोह लेता है। कविता लघु आकार की है और यह कहती है कि

हम बच्चों से वुफछ-न-वुफछ सीख सकते हैं। कविता की भाषा सहज है।

                                          ——बनारस——-

इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरप़्

ाफ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है

जो नहीं है वह पेंफकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्वमेध पर जाता है

और पाता है घाट का आखिरी पत्थर

वुफछ और मुलायम हो गया है

सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है

भिखारियों वेफ कटोरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है

खाली कटोरों में वसंत का उतरना!

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोश-रोश एक अनंत शव

ले जाते हैं वंफधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरप़्

ाफ

इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग

धीरे-धीरे बजते हैं घंटे

शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि वुफछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है वुफछ भी

कि जो चीश जहाँ थी

वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाउँफ

सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना वेफ

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती वेफ आलोक म

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्रा में

आधा पूफल में है

आधा शव में

आधा नींद में है

आधा शंख में

अगर ध्यान से देखो

तो यह आधा है

और आधा नहीं है

जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्तंभ वेफ

जो नहीं है उसे थामे है

राख और रोशनी वेफ उँफचे-उँफचे स्तंभ

आग वेफ स्तंभ

और पानी वेफ स्तंभ

धुएँ वेफ

खुशबू वेफ

आदमी वेफ उठे हुए हाथों वेफ स्तंभ

किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अघ्र्य

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा वेफ जल में

अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर

अपनी दूसरी टाँग से

बिलवुफल बेखबर!

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