केशवदास | keshavdas | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

 

              केशवदास | keshavdas | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

                                                                        Chapter 10 

केशवदास

सन् 1555-1617

केशवदास का जन्म बेतवा नदी वेफ तट पर स्थित ओड़छा नगर में हुआ

ऐसा माना जाता है। ओड़छापति महाराज इंद्रजीत सिह उनके प्रधान

आश्रयदाता थे जिन्होंने 21 गाँव उन्हें भेंट में दिए थे। उन्हें वीर¯सह देव

का आश्रय भी प्राप्त था। वे साहित्य और संगीत, धर्मशास्त्रा और राजनीति, ज्योतिष और वैद्यक सभी

विषयों वेफ गंभीर अध्येता थे। वेफशवदास की रचना में उनवेफ तीन रूप आचार्य, महाकवि और

इतिहासकार दिखाई पड़ते हैं।

आचार्य का आसन ग्रहण करने पर वेफशवदास को संस्कृत की शास्त्राीय प(ति को हिंदी में

प्रचलित करने की ¯चता हुई जो जीवन वेफ अंत तक बनी रही। वेफशवदास ने ही  हिदी में संस्कृत की

परंपरा की व्यवस्थापूर्वक स्थापना की थी। उनवेफ पहले भी रीतिग्रंथ लिखे गए पर व्यवस्थित और

सर्वांगपूर्ण ग्रंथ सबसे पहले उन्होंने प्रस्तुत किए। उनकी मृत्यु सन् 1617 ई. में हुई।

उनकी प्रमुख प्रामाणिक रचनाएँ हैं रसिक प्रिया, कवि प्रिया, रामचंद्रचंद्रिका, वीर सहदेव

चरित, विज्ञान गीता, जहाँगीर जसचंद्रिका आदि। रतनबावनी का रचनाकाल अज्ञात है किंतु उसे

उनकी सर्वप्रथम रचना माना जाता है।

केशव की काव्यभाषा ब्रज है। बुंदेल निवासी होने वेफ कारण उनकी रचना में बुंदेली वेफ शब्दों

का प्रयोग भी मिलता है, संस्कृत का प्रभाव तो है ही। इस पुस्तक में उनकी प्रसिद्ध रचना

रामचंद्रचंद्रिका का एक अंश दिया गया है जिसमें वेफशवदास ने माँ सरस्वती की उदारता और

वैभव का गुणगान किया है। माँ सरस्वती की महिमा का ऐसा वर्णन ऋषि, मुनियों और देवताओं

वेफ द्वारा भी संभव नहीं है। दूसरे छंद सवैया में कवि ने पंचवटी वेफ माहात्म्य का सुंदर वर्णन

किया है।

अंतिम छंद में अंगद द्वारा किया गया श्रीरामचंद्र जी वेफ गुणों का वर्णन है। वह रावण को

समझाते हुए कह रहा है कि राम का वानर हनुमान समुद्र को लाँघकर लंका में आ गया और

तुमसे वुफछ करते नहीं बना। इसी प्रकार तुमसे लक्ष्मण द्वारा खींची गई धनुरेखा भी पार नहीं

की गई थी। तुम श्रीराम वेफ प्रताप को पहचानो।

                            रामचंद्रचंद्रिका                        

                                      सरस्वती वंदना

बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।

देवता प्रसि( सि( रिषिराज तपबृंद कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई।

भावी भूत बर्तमान जगत बखानत है ‘वेफसोदास’ क्यों हू ना बखानी काहू पै गई।

पति बर्नै  चारमुख पूत बर्नै  पाँचमुख नाती बर्नै  षटमुख तदपि नई नई।।

                                    पंचवटी-वन-वर्णन

सब जाति पफटी दुख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी।

निघटी रुचि मीचु घटी हूँ घटी जगजीव जतीन की छूटी तटी।

अघओघ की बेरी कटी बिकटी निकटी प्रकटी गुरुज्ञान-गटी।

चहुँ ओरनि नाचति मुक्तिनटी गुन धूरजटी वन पंचबटी।।

                                     अंगद

सिंधु तर्यो उनको बनरा तुम पै धनुरेख गई न तरी।

बाँधोई बाँधत सो न बन्यो उन बारिधि बाँधिवैफ बाट करी।

श्रीरघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसवंफठ न जानि परी।

तेलनि तूलनि पूँछि जरी न जरी, जरी लंक जराइ-जरी।।

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