फणीश्वरनाथ रेणु | Phanishwarnath Renu | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2



फणीश्वरनाथ रेणु

सन् 1921-1977द्ध

पफणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म बिहार वेफ पूर्णिया शिले वेफ औराही

¯हगना नामवफ गाँव में हुआ था। उन्होंने 1942 ई. वेफ

‘भारत छोड़ो’ स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया। नेपाल वेफ

राणाशाही विरोधी आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। वे

राजनीति में प्रगतिशील विचारधारा वेफ समर्थक थे। 1953 ई. में

वे साहित्य-सृजन वेफ क्षेत्रा में आए और उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा निबंध आदि विविध साहित्यिक

विधाओं में लेखन कार्य किया।

रेणु ¯हदी वेफ आंचलिक कथाकार हैं। उन्होंने अंचल-विशेष को अपनी रचनाओं का आधार

बनाकर, आंचलिक शब्दावली और मुहावरों का सहारा लेते हुए, वहाँ वेफ जीवन और वातावरण का

चित्राण किया है। अपनी गहरी मानवीय संवेदना वेफ कारण वे अभावग्रस्त जनता की बेबसी और पीड़ा

स्वयं भोगते-से लगते हैं। इस संवेदनशीलता वेफ साथ उनका यह विश्वास भी जुड़ा है कि आज वेफ

त्रास्त मनुष्य वेफ भीतर अपनी जीवन-दशा को बदल देने की अवूफत ताकत छिपी हुई है।

उनवेफ प्रसि( कहानी-संग्रह हैंµठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक। तीसरी कसम

उप्ऱ्ाफ मारे गए गुलपफाम कहानी पर प़्ि

ाफल्म भी बन चुकी है। मैला आँचल और परती परिकथा

उनवेफ उल्लेखनीय उपन्यास हैं।

पफणीश्वरनाथ रेणु स्वतंत्रा भारत वेफ प्रख्यात कथाकार हैं। रेणु ने अपनी रचनाओं वेफ द्वारा प्रेमचंद्र

की विरासत को नयी पहचान और भंगिमा प्रदान की। इनकी कला सजग आँखें, गहरी मानवीय

संवदेना और बदलते सामाजिक यथार्थ की पकड़ अपनी अलग पहचान रखते हैं। रेणु ने मैला

आँचल, ‘परती परिकथा’ जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों वेफ साथ अपने शिल्प और आस्वाद में

भिन्न ¯हदी कथा-नई परंपरा को जन्म दिया। आधुनिकतावादी पैफशन से दूर ग्रामीण समाज रेणु की

कलम से इतना रससिक्त, प्राणवान और नया आयाम ग्रहण कर सका है कि नगर एवं ग्राम वेफ

विवादों से अलग उसे नयी सांस्कृतिक गरिमा प्राप्त हुई। रेणु की कहानियों में आंचलिक शब्दों वेफ

प्रयोग से लोकजीवन वेफ मा£मक स्थलों की पहचान हुई है। उनकी भाषा संवेदनशील, संप्रेषणीय एवं

भाव प्रधान है। मर्मांतक पीड़ा और भावनाओं वेफ द्वंद्व को उभारने में लेखक की भाषा अंतरमन को

छू लेती है।

संवदिया कहानी में मानवीय संवेदना की गहन एवं विलक्षण पहचान प्रस्तुत हुई है। असहाय

और सहनशील नारी मन वेफ कोमल तंतु की, उसवेफ दुख और करुणा की, पीड़ा तथा यातना

की ऐसी सूक्ष्म पकड़ रेणु जैसे ‘आत्मा वेफ शिल्पी’ द्वारा ही संभव है। हरगोबिन संवदिया की

तरह अपने अंचल वेफ दुखी, विपन्न बेसहारा बड़ी बहुरिया जैसे पात्रों का संवाद लेकर रेणु

पाठकों वेफ सम्मुख उपस्थित होते हैं। रेणु ने बड़ी बहुरिया की पीड़ा को उसवेफ भीतर वेफ

हाहाकार को संवदिया वेफ माध्यम से अपनी पूरी सहानुभूति प्रदान की है। लोकभाषा की नींव

पर खड़ी संवदिया कहानी पहाड़ी झरने की तरह गतिमान है। उसकी गति, लय, प्रवाह, संवाद

और संगीत पढ़ने वाले वेफ रोम-रोम में झंकृत होने लगता है।

                                        संवदिया

हरगोबिन को अचरज हुआµतो आज भी किसी को संवदिया की शरूरत पड़ सकती है। इस शमाने

में जबकि गाँव-गाँव मंे डाकघर खुल गए हैं, संवदिया वेफ मारप़्

ाफत संवाद क्यों भेजेगा कोई? आज

तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहाँ का वुफशल संवाद मँगा सकता है।

पिफर उसकी बुलाहट क्यों हुई?

हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी ड्योढ़ी पारकर अंदर गया। सदा की भाँति उसने वातावरण को

सूँघकर संवाद का अंदाश लगाया।… निश्चय ही कोई गुप्त समाचार ले जाना है। चाँद-सूरज को भी

नहीं मालूम हो। परेवा-पंछी तक न जाने।

फ्पाँव लागी, बड़ी बहुरिया।य्

बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आँख वेफ इशारे से वुफछ देर

चुपचाप बैठने को कहा। बड़ी हवेली अब नाममात्रा को ही बड़ी हवेली है। जहाँ दिनरात

नौकर-नौकरानियांे और जन-मशदूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया

अपने हाथ से सूपा में अनाज लेकर पफटक रही है। इन हाथों में सिप़्र्

ाफ मेहँदी लगाकर ही गाँव की

नाइन परिवार पालती थी। कहाँ गए वे दिन? हरगोबिन ने लंबी साँस ली।

बड़े भैया वेफ मरने वेफ बाद ही जैसे सब खेल खत्म हो गया। तीनों भाइयों ने आपस में

लड़ाई-झगड़ा शुरू किया। रैयतों ने शमीन पर दावे करवेफ दखल किया, पिफर तीनों भाई गाँव छोड़कर

शहर में जा बसे, रह गई बड़ी बहुरियाµकहाँ जाती बेचारी! भगवान भले आदमी को ही कष्ट देते

हैं। नहीं तो एक घंटे की बीमारी में बड़े भैया क्यों मरते?…बड़ी बहुरिया की देह से शेवर

खींच-छीनकर बँटवारे की लीला हुई थी। हरगोबिन ने देखी है अपनी आँखों से द्रौपदी चीर-हरण

लीला! बनारसी साड़ी को तीन टुकड़े करवेफ बँटवारा किया था, निर्दय भाइयों ने। बेचारी बड़ी

बहुरिया! गाँव की मोदिआइन बूढ़ी न जाने कब से आँगन में बैठकर बड़बड़ा रही थी, फ्उधर का सौदा

खाने में बड़ा मीठा लगता है और दाम देते समय मोदिआइन की बात कड़वी लगती है। मैं आज

दाम लेकर ही उठँूगी।य्ब ड़ी बहुरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

हरगोबिन ने पिफर लंबी साँस ली। जब तक यह मोदिआइन आँगन से नहीं टलती, बड़ी बहुरिया

हरगोबिन से वुफछ नहीं बोलेगी। वह अब चुप नहीं रह सका, फ्मोदिआइन काकी, बाकी-बकाया

वसूलने का यह काबुली-कायदा तो तुमने खूब सीखा है।य्

‘काबुली-कायदा’, सुनते ही मोदिआइन तमककर खड़ी हो गई, फ्चुप रह मुँह-झौंसे! निमौछिये…य्।

फ्क्या करूँ काकी, भगवान ने मूँछ-दाढ़ी दी नहीं, न काबुली आगा साहब की तरह गुलशार

दाढ़ी…।य्

फ्पिफर काबुली का नाम लिया तो जीभ पकड़कर खींच लूँगी।य्

हरगोबिन ने जीभ बाहर निकालकर दिखलाई। अर्थात्µखींच ले।

…पाँच साल पहले गुल मुहम्मद आगा उधर कपड़ा लगाने वेफ लिए गाँव में आता था और

मोदिआइन वेफ ओसारे पर दुकान लगाकर बैठता था। आगा कपड़ा देते समय बहुत मीठा बोलता और

वसूली वेफ समय शोर-शुल्म से एक का दो वसूलता। एक बार कई उधर लेनेवालों ने मिलकर

काबुली की ऐसी मरम्मत कर दी कि पिफर लौटकर गाँव में नहीं आया। लेकिन इसवेफ बाद ही दुखनी

मोदिआइन लाल मोदिआइन हो गई।… काबुली क्या, काबुली बादाम वेफ नाम से भी चिढ़ने लगी

मोदिआइन। गाँव वेफ नाचनेवालों ने नाच में काबुली का स्वांग किया था। फ्तुम अमारा मुलुक जाएगा

मोदिआइन? अम काबुली बादाम-पिस्ता-अकरोट किलायगा…!य्

मोदिआइन बड़बड़ाती, गाली देती हुई चली गई तो बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन से कहा,

फ्हरगोबिन भाई, तुमको एक संवाद ले जाना है। आज ही। बोलो, जाओगे न?य्

फ्कहाँ?य्

फ्मेरी माँ वेफ पास।य्

हरगोबिन बड़ी बहुरिया की छलछलाई आँखों में डूब गया, फ्कहिए, क्या संवाद है?य्

संवाद सुनाते समय बड़ी बहुरिया सिसकने लगी। हरगोबिन की आँखें भी भर आईं।… बड़ी

हवेली की लक्ष्मी को पहली बार इस तरह सिसकते देखा है हरगोबिन ने। वह बोला, फ्बड़ी बहुरिया,

दिल को कड़ा कीजिए।य्

फ्और कितना कड़ा करूँ दिल?… माँ से कहना, मैं भाई-भाभियों की नौकरी करवेफ पेट पालूँगी।

बच्चांे की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी, लेकिन यहाँ अब नहीं… अब नहीं रह सवूँफगी।

…कहना, यदि माँ मुझे यहाँ से नहीं ले जाएगी तो मैं किसी दिन गले में घड़ा बाँधकर पोखरे में डूब

मरुँ गी।… बथुआ-साग खाकर कब तक जीउँफ? किसलिए… किसवेफ लिए?य्

हरगोबिन का रोम-रोम कलपने लगा। देवर-देवरानियाँ भी कितने बेदर्द हैं। ठीक अगहनी धान

वेफ समय बाल-बच्चों को लेकर शहर से आएँगे। दस-पंद्रह दिनों में कर्श-उधार की ढेरी लगाकर,

वापस जाते समय दो-दो मन वेफ हिसाब से चावल-चूड़ा ले जाएँगे। पिफर आम वेफ मौसम में आकर

हाशिर। कच्चा-पक्का आम तोड़कर बोरियों में बंद करवेफ चले जाएँगे। पिफर उलटकर कभी नहीं

देखते…राक्षस हैं सब!

Chapter 15 – फणीश्वरनाथ रेणु

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