तुलसीदास | Tulsidas तुलसीदास | Tulsidas | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

तुलसीदास | Tulsidas तुलसीदास | Tulsidas | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

Chapter 7 

 तुलसीदास

;सन् 1532-1623द्ध

तुलसीदास का जन्म बाँदा शिले वेफ राजापुर गाँव में हुआ था। वुफछ

विद्वान उनका जन्म स्थान सोरों, एटा को भी मानते हैं। हालाँकि

उनवेफ जन्म स्थान वेफ बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। तुलसीदास का

बचपन घोर कष्ट में बीता। बालपन में ही उनका माता-पिता से

बिछोह हो गया था और भिक्षाटन द्वारा वे अपना जीवन-यापन करने को विवश हुए। कहा जाता है, गुरफ

नरहरिदास की कृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला। रत्नावली से उनका विवाह होना और उनकी बातों

से प्रभावित होकर तुलसीदास का गृहत्याग करने की कथा प्रसि( है, ¯कतु इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता।

पारिवारिक जीवन से विरक्त होने वेफ बाद वे काशी, चित्रावूफट, अयोध्या आदि तीर्थों में भ्रमण करते रहे। सन्

1574 में अयोध्या में उन्होंने रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की, जिसका वुफछ अंश उन्होंने काशी में

लिखा। बाद में वे काशी में रहने लगे थे और यहीं उनका निधन हुआ।

तुलसीदास लोकमंगल की साधना वेफ कवि हैं। उन्हें समन्वय का कवि भी कहा जाता है।

तुलसीदास का भावजगत धार्मिक, संास्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत व्यापक है। मानव-प्रकृति

और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतरदृष्टि और व्यापक जीवनानुभव वेफ कारण ही वे रामचरितमानस

में लोकजीवन वेफ विभिन्न पक्षों का उद्घाटन कर सवेफ। मानस में उनवेफ हृदय की विशालता, भाव

प्रसार की शक्ति और मर्मस्पर्शी स्थलों की पहचान की क्षमता पूरे उत्कर्ष वेफ साथ व्यक्त हुई है।

तुलसी को मानस में जिन प्रसंगों की अभिव्यक्ति का अवसर नहीं मिला उनको उन्होंने कवितावली,

गीतावली आदि में व्यक्त किया है। विनयपत्रिका में विनय और आत्म-निवेदन वेफ पद हैं। इस

प्रकार तुलसी वेफ काव्य में विश्वबोध और आत्मबोध का अद्वितीय समन्वय हुआ है।

तुलसीदास की रचनाओं में भाव, विचार, काव्यरूप, छंद-विवेचन और भाषा की विविधता

मिलती है। रामचरितमानस ¯हदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इसकी रचना मुख्यतः दोहा

और चैपाई छंद में हुई है। इसकी भाषा अवधी है। गीतावली, कृष्ण गीतावली तथा विनयपत्रिका

पद शैली की रचनाएँ हैं तो दोहावली स्पुफट दोहों का संकलन। कवितावली कवित्त और सवैया

छंद में रचित उत्कृष्ट रचना है।

्रज और अवधी दोनों ही भाषाओं पर तुलसी का असाधारण अधिकार था। तुलसीकृत बारह

कृतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं परंतु रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली और विनयपत्रिका

ही उनकी ख्याति वेफ आधार हैं।

पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत चैपाई और दोहों को रामचरितमानस वेफ अयोध्या कांड से लिया गया

है। इन छंदों में राम वनगमन वेफ पश्चात् भरत की मनोदशा का वर्णन किया गया है। भरत भावुक

हृदय से बताते हैं कि राम का उनवेफ प्रति अत्यधिक प्रेमभाव है। वे बचपन से ही भरत को खेल

में भी सहयोग देते रहते थे और उनका मन कभी नहीं तोड़ते थे। वे कहते हैं कि इस प्रेमभाव

को भाग्य सहन नहीं कर सका और माता वेफ रूप में उसने व्यवधान उपस्थित कर दिया। राम

वेफ वन गमन से अन्य माताएँ और अयोध्या वेफ सभी नगरवासी अत्यंत दुखी हैं।

इस पाठ वेफ अगले अंश में गीतावली वेफ दो पद दिए गए हैं जिनमें से प्रथम पद में राम

वेफ वनगमन वेफ बाद माता कौशल्या वेफ हृदय की विरह वेदना का वर्णन किया गया है। वे

राम की वस्तुओं को देखकर उनका स्मरण करती हैं और बहुत दुखी हो जाती हैं। दूसरे पद

में माँ कौशल्या राम वेफ वियोग में दुखी अश्वों को देखकर राम से एक बार पुनः अयोध्यापुरी

आने का निवेदन करती हैं।

    भरत-राम का प्रेम

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।

मैं जानउँ निज नाथ सुभाउफ।

मो पर कृपा सनेहु बिसेखी।

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू।

मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही।

नीरज नयन नेह जल बाढ़े ।।

एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।

अपराधिहु पर कोह न काउफ।।

खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।

हारेंहूँ खेल जिताव¯ह मोंही।।

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।

दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।

बिधि न सवेफउ सहि मोर दुलारा।

यहउ कहत मोहि आजु न सोभा।

मातु मंदि मैं साधु सुचाली।

पफरइ कि कोदव बालि सुसाली।

सपनेहँु दोसवफ लेसु न काहू।

बिनु समुझें निज अघ परिपावूफ।

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा।

गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू।

नीच बीचु जननी मिस पारा।।

अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।

उर अस आनत कोटि वुफचाली।।

मुवफता प्रसव कि संबुक काली।।

मोर अभाग उदधि अवगाहू।।

जारिउँ जायँ जननि कहि कावूफ।।

एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।।

लागत मोहि नीक परिनामू।।

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।

प्रेम प्रपंचु कि झूठ पुफर जान¯ह मुनि रघुराउ।।

भूपति मरन पेम पनु राखी।
देखि न जा¯ह बिकल महतारीं।
महीं सकल अनरथ कर मूला।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा।
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू।
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी।
जननी वुफमति जगतु सबु साखी।।
जर¯ह दुसह जर पुर नर नारीं।।
सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाएँ।।
वुफलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।
जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।
तज¯ह बिषम बिषु तापस तीछी।।
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।

Chapter 7 – तुलसीदास

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