विद्यापति | Vidyapati | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

                      विद्यापति | Vidyapati | NCERT 12TH | Hindi | Aaroh Bhag 2

                                                                           Chapter 9

विद्यापति

;सन् 1380-1460द्ध

विद्यापति का जन्म मधुबनी ;बिहारद्ध वेफ बिस्पी गाँव वेफ एक

ऐसे परिवार में हुआ जो विद्या और ज्ञान वेफ लिए प्रसि( था।

उनवेफ जन्मकाल वेफ संबंध में प्रामाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है।

उनवेफ रचनाकाल और आश्रयदाता वेफ राज्यकाल वेफ आधार पर उनवेफ जन्म और मृत्यु वर्ष का

अनुमान किया गया है। विद्यापति मिथिला नरेश राजा शिव¯सह वेफ अभिन्न मित्रा, राजकवि और

सलाहकार थे।

विद्यापति बचपन से ही अत्यंत वुफशाग्र बु(ि और तर्वफशील व्यक्ति थे। साहित्य, संस्कृति, संगीत,

ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि वेफ वे प्रकांड पं डित थे। उन्होंने संस्कृत, अवह‘ ;अपभ्रंशद्ध

और मैथिलीµतीन भाषाओं में रचनाएँ कीं। इसवेफ अतिरिक्त उन्हें और भी कई भाषाओं-उपभाषाओं का

ज्ञान था।

वे आदिकाल और भक्तिकाल वेफ संधिकवि कहे जा सकते हैं। उनकी कीर्तिलता और

कीर्तिपताका जैसी रचनाओं पर दरबारी संस्कृति और अपभं्रश काव्य परंपरा का प्रभाव है तो उनकी

पदावली वेफ गीतों में भक्ति और शंृगार की गूँज है। विद्यापति की पदावली ही उनवेफ यश का मुख्य

आधार है। वे ¯हदी साहित्य वेफ मध्यकाल वेफ पहले ऐसे कवि हैं जिनकी पदावली में जनभाषा में

जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मिथिला क्षेत्रा वेफ लोक-व्यवहार में और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में उनवेफ पद इतने रच-बस गए हैं

कि पदों की पंक्तियाँ अब वहाँ वेफ मुहावरे बन गई हैं। पद लालित्य, मानवीय प्रेम और व्यावहारिक

जीवन वेफ विविध रंग इन पदों को मनोरम और आकर्षक बनाते हैं। राधा-कृष्ण वेफ प्रेम वेफ माध्यम

से लौकिक प्रेम वेफ विभिन्न रूपों का चित्राण, स्तुति-पदों में विभिन्न देवी-देवताओं की भक्ति, प्रकृति

संबंधी पदों में प्रकृति की मनोहर छवि रचनाकार वेफ अपूर्व कौशल, प्रतिभा और कल्पनाशीलता वेफ

परिचायक हैं। उनवेफ पदों में प्रेम और सौंदर्य की अनुभूति की जैसी निश्छल और प्रगाढ़ अभिव्यक्ति

हुई है वह अन्यत्रा दुर्लभ है।

उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैंµकीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली

और पदावली।

इस पाठ्यपुस्तक में विद्यापति वेफ तीन पद लिए गए हैं। पहले में विरहिणी वेफ हृदय वेफ उद्गारों

को प्रकट करते हुए उन्होंने उसको अत्यंत दुखी और कातर बताया है। उसका हृदय प्रियतम द्वारा

हर लिया गया है और प्रियतम गोवुफल छोड़कर मधुपुर जा बसे हैं। कवि ने उनवेफ कार्तिक मास

में आने की संभावना प्रकट की है।

दूसरे पद में प्रियतमा सखि से कहती है कि मैं जन्म-जन्मांतर से अपने प्रियतम का रूप

ही देखती रही पंरतु अभी तक नेत्रा संतुष्ट नहीं हुए हैं। उनवेफ मधुर बोल कानों में गूँजते रहते हैं।

तीसरे पद में कवि ने विरहिणी प्रियतमा का दुखभरा चित्रा प्रस्तुत किया है। दुख वेफ कारण

नायिका वेफ नेत्रांे से अश्रुधारा बहे चली जा रही है जिससे उसवेफ नेत्रा खुल नहीं पा

रहे। वह विरह में क्षण-क्षण क्षीण होती जा रही है।

                                                          पद

                                                             1

वेफ पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास।

हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास।।

एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।

सखि अनकर दुख दारुन रे जग वेफ पतिआए।।

मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनो मन गेल।

गोवुफल तेजि मधुपुर बस रे कन अपजस लेल।।

विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस।

आओत तोर मन भावन रे एहि कातिक मास।।

                                                  2

सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए।

सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल तिल नूतन होए।।

जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।

सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।

कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन वेफलि।।

लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल।।

कत बिदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख।।

विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक।।

                                                3

वुफसुमित कानन हेरि कमलमुखि,

मूदि रहए दु नयान।

कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि,

2020.21 © छब्म्त्ज्

दवज जव इम तमचनइसपेीमक

58/अंतरा

कर देइ झाँपइ कान।।

माधब, सुन-सुन बचन हमारा।

तुअ गुन सुंदरि अति भेल दूबरिµ

गुनि-गुनि प्रेम तोहारा।।

धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ,

पुनि तहि उठइ न पारा।

कातर दिठि करि, चैदिस हेरि-हेरि

नयन गरए जल-धारा।।

तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिनµ

चैदसि-चाँद-समान।

भनइ विद्यापति सिब¯सह नर-पति

लखिमादेइ-रमान।।

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